जमर: चारण जाति की स्त्रियों में प्रतिकार की परंपरा

Abstract

इस सृष्टि की रचना और संचालन निगमों के अनुसार होता है। जब जब नियमों के पालन की परंपरा में विचलन हुआ तब तब किसी न किसी ने प्रतिकार कर पुनः व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया है। मध्यकाल में राजस्थान, गुजरात, मालवा प्रदेश में रहने वाली चारण जाति को उनकी प्रशासनिक और साहित्यिक योग्यता के कारण और सत्ता की वैधता को जन जन तक पहुचाने की क्षमता के कारण भूमि अनुदान में गांव प्रदान किये गए। जो पूर्णतः स्वायत्त और गैर हस्तांतरित होने के कारण स्वशासन या साँसन कहलाये।  जब शासक वर्ग ने उन साँसन गांवों के हस्तक्षेप किया या उस गांव की रैयत को प्रताड़ित किया जब चारणों ने सत्याग्रह किये। पुरुषों द्वारा धरना, तागा और धागा किया गया। वही स्त्रियों ने जमर किये।जमर सती और जौहर से  अलग परम्परा थी। सती पति की मृत्यु के बाद पति के मृत शरीर या उसकी निशानी के साथ अग्नि में बैठकर जलने को कहा जाता है। जौहर युद्ध मे पुरुषों द्वारा केसरिया करने या युद्ध की स्थिति में स्त्रियां स्वयम के सतीत्व की रक्षा के लिए आग में कूद पड़ती थी। वही जमर  जब सार्वजनिक व्यवस्था को धत्ता बताने वाले कृत्य सत्ताधारियों द्वारा किये गए तब उनका प्रतिकार करने के लिए आग में बैठकर प्राण त्यागे जाते थे। जमर अविवाहित कन्याओं, विवाहित और सधवा स्त्रियों तथा विधवा स्त्रियों( पति की मृत्यु का सम्बध होना जरूरी नही था) द्वारा किये गए। जमर साँसन गांव की रैयत, जो दान ग्रहीता के प्रजा थी के ऊपर जब किसी ने जुल्म किया तब उसका विरोध करते हुए आत्म बलिदान दिया। गोमा, जोमा, हरिया, वीरा, उमा,कलु आदि ने मेघवाल, जाट, दर्जी, माली, खत्री, बनिया आदि के संम्मान के लिए स्थानीय शासकों जैसे जमीदार, जागीरदार और हाकिमों के विरुद्ध जमर किये। 

                             चारण स्त्रियों ने पर्यावरण और जीवों की रक्षा के लिए भी जमर किये। जब पुनसरी ने घायल खरगोश की रक्षा के लिए तो नीलगाय की रक्षा के लिए गुजरात के मिति में  22 स्त्रियों ने सामूहिक जमर किये।  चारण स्त्रियों ने न केवल अपने बल्कि अपने गांव की स्त्रियों के सतीत्व की रक्षा के लिए जमर किये। जीवणी ने बाकर खान के विरुद सरधार में जमर किया। वही खाटा वास में डाही ने गोवर्धन खिंची द्वारा दावड़ी(दासी) को अपहृत करने के विरोध में जमर किया। सभाई ने कपूरड़ी में जमर किया।  जामनगर में कामाई  ने जमर किया | शरणागत की रक्षा करना मध्यकालीन जीवन मे महत्वपूर्ण था। चारण स्त्रियों ने भी शरणागत के लिए जमर किये। झणकली में देमा ने भाटी फतेहसिंह को शरण दी उसकी रक्षा के लिए गुड़ा के राणा के विरुद्ध अपनी जेठ – पुत्री के साथ जमर किया। झांफली में राणा ने सिंधी लावणा  को शरण दी और अपने पुत्रवत दुर्जनशाल के विरुद्ध जमर किया | गलत को गलत होने का अहसास कराने 

                              जमर का उद्देश्य  मात्र प्राण त्यागना ही नहीं था  बल्कि गलत को गलत होने का अहसास कराना , स्व हित की बजाय पर हित  के लिए जीना और जरूरत पड़े तो प्राण त्यागने में भी न हिचकना , शोषित और वंचित वर्ग के मानव अधिकारों की रक्षा करना , दिए हुए वचन को निभाने और शरणागत की रक्षा करना , और  मूक प्राणियों और पशुओं  की जान बचाना था | सदियों से जुल्मियों का विरोध होता आया है लेकिन चारण  जाति  में  स्त्रियों ने जो आत्मबलिदान की परम्परा पेश की वह  अन्य समाजों में दृष्टिगोचर नहीं होता | गांव गांव में उनके मंदिर , चौंतरे , देवलिया स्थापित क्र उनके समाज हित  के कार्य को आदर्श के रूप में स्थापित कर  रखा है| लोक गीतों , छंदों और कविताओं में उनका अविस्मरणीय बना दिया है | जमर की बहुत सी घटनाएं  अभी प्रकाश में आनी  है | रावों  और भाटों  की बहियों , अभिलेखों , और स्मारकों की खोज और व्याख्या करने की जरूरत है ताकि इसके बहुत से नए आयाम सामने आ सके | 

कीवर्ड : जमर, चारण जाति, स्त्रियों में प्रतिकार की परंपरा

मोहन दान

सहायक आचार्य इतिहास
राजकीय महाविद्यालय शेरगढ़ , जोधपुर
ईमेल : mdjheeba89@gmail.com

DOI

Downloads

Leave a Reply